Tuesday, 6 July 2021

राजभाषा नीति

  भाषा मनुष्य के लिए एक ऐसा उपकरण है जिसके बिना वह न तो लिख सकता है और न ही सोच सकता है। भाषा में व्यक्ति के चेहरे से लेकर चित्त तक की तस्वीरें आ जाती हैं। भाषा का निर्माता केवल उसका प्रयोगकर्ता है, चाहे वह संसद भवन हो, विश्वविद्यालय हो, चाहे सब्जी मंडी हो। भाषा तो प्रयोग से बढ़ती है, किसी प्रयोगशाला से नहीं। इसका प्रयोग भी समाज पर निर्भर करता है। प्रयोग स्थल के अभाव में भाषा का विकास बाधित होता है। भाषा से हम जितनी अधिक माँग करेंगे और उस प्रयोग का जितना अधिक दबाव डालेंगे, भाषा उतनी जल्दी समर्थ और समृद्ध बना देगी। समाज की आर्थिक,राजनैतिक, धार्मिक, भौगोलिक स्थितियाँ भी भाषा को प्रभावित करती रहती हैं। कोई भी भाषा समाज की आवश्यकता एवं उन्नति के साथ विकसित एवं परिवर्धित होती है। इस प्रकार भाषा और समाज सिक्के के दो पार्श्व की भांति है जिन्हें एक दूसरे से विलग करना संभव नहीं होता है। ये एक बिंदु से प्रारंभ होकर अंत तक साथ-साथ चलते हैं और आद्यतः अन्योन्याश्रित रहते हैं।

 किसी भी देश का संविधान उसकी पावनतम निधि होता है। जिन मूलभूत तत्वों के कारण कोई देश राष्ट्र कहलाता है, उनमें उस राष्ट्र के संविधान, राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान के साथ राष्ट्रभाषा या राजभाषा का भी महत्वपूर्ण स्थान है। स्वाधीनता आंदोलन में राजनीतिक चेतना जागृत करने में हिंदी का बड़ा हाथ रहा था। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह संदेश कि स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है  जन-जन तक पहुँचाने वाली भाषा यही थी। आजादी की लड़ाई लड़ते समय हमारी यह कामना थी कि स्वतंत्र राष्ट्र की अपनी एक राष्ट्रभाषा होगी जिससे देश एकता के सूत्र में सदा के लिए जुड़ा रहेगा।

 

आजादी के बाद यह महसूस किया गया कि प्रशासन की भाषा का स्थान किसी भारतीय भाषा को दिया जाए। हिंदी इस समय तक लगभग सारे देश में संपर्क की भाषा बन चुकी थी। 06 तथा 07 अगस्त, 1949 को ''राष्ट्रभाषा व्यवस्था परिषद्' का एक महत्वपूर्ण अधिवेशन दिल्ली में हुआ। इसमें  एक प्रस्ताव पारित किया कि देवनागरी में लिखित हिंदी ही देश की राजभाषा बनाई जाए।  अंत में संविधान सभा ने 14 सितंबर, 1949 को  हिंदी को राजभाषा घोषित कर संविधान में राजभाषा के संबंध में अनुच्छेद 343 से 351 तक व्यवस्था कर दी। संविधान सभा ने जो निर्णय लिए वह आकस्मिक नहीं थे। उनके पीछे ऐतिहासिक महत्व की अनेक घटनाओं और परंपराओं की एक दीर्घ श्रृंखला थी। संविधान सभा में भाषा संबंधी मुद्दे पर हुई बहस 12 सितंबर,1949 को दोपहर 4 बजे से शुरू होकर 14 सितंबर,1949 के दिन शाम को समाप्त हुई। इस मसले पर बोलने के लिए सभा के इतने सदस्य उत्सुक थे कि अध्यक्ष को इस बहस के लिए निश्चित अवधि से नौ घंटे और देने पड़े। संविधान सभा की बहस लगभग 278 पृष्ठों में मुद्रित हुई है। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ.राजेन्द्र प्रसाद ने अपने संबोधन में सदस्यों से अनुरोध किया कि भाषा के प्रश्न पर संविधान सभा का निर्णय समूचे देश को मान्य होना चाहिए। तर्क-वितर्क, विचार-विमर्श, पक्ष-विपक्ष, लाभ-हानि का समग्र विश्लेषण करने के पश्तात् 14 सितंबर,1949 को संविधान सभा ने हिंदी की लोकप्रियता, व्यापकता, वैज्ञानिकता, सफलता और बोधगम्यता को ध्यान में रखते हुए इसे देश की राजभाषा के रूप में सर्वसम्मति से स्वीकार किया। संविधान के अनुच्छेद 343 से लेकर 351 तक में विस्तार से इसका उल्लेख किया गया है।  संविधान का अनुच्छेद 351 अपने-आप में अद्वितीय है और वह देश के भाषिक इतिहास, वर्तमान तथ्यों और भविष्य की आकांक्षाओं को एक सुबद्ध योजना के रूप में प्रस्तुत करता है। इस अनुच्छेद का उद्धरण इस प्रकार हैः-

 " संघ का कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाएं ,उसका विकास करे जिससे वह  भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम हो सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्तानी में और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की  अन्य भाषाओं में प्रयुक्त  रूप,शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहाँ आवश्यक या वांछनीय हो वहां उसके शब्द भंडार  के लिए मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी  मृद्धि सुनिश्चित करे।"  स्पष्ट है कि  इसके अनुसार संघ की राजभाषा तथा देश की संपर्क भाषा के रूप में हिंदी के विकास की दिशा का संकेत दिया गया है। संविधान के निर्माताओं ने इस भाषा के एक अखिल भारतीय रूप की कल्पना की है जो अन्य भारतीय भाषाओं की सहायता लेकर हिंदीतर भाषी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों द्वारा व्यापक रूप से अपनाई जा सके।

किसी भी देश के लिए यह आवश्यक नहीं है कि सारे देश की केवल एक भाषा हो, सभी का एक धर्म हो और सभी प्रजाति के हों। फिर भी, एक भाषा की अनिवार्यता न होते हुए भी अलग-अलग भाषाओं के बीच एक सेतु की आवश्यकता तो है ही। इसी विचार को दृष्टिगत रखते हुए हमारे संविधान में अनुच्छेद 346 के अंतर्गत संपर्क भाषा का प्रावधान किया गया है। भारत की आबादी की लगभग आधा हिस्सा हिंदी भाषी है। वह करोड़ों लोगों की मातृभाषा है, कई और करोड़ लोगों की वह मातृभाषा नहीं है किन्तु वे उसे समझ लेते हैं और सीमित रूप में उसमें कार्य व्यवहार भी करते हैं। भारत की भाषाओं में  हिंदी ही एक ऐसी  भाषा है, जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक तथा कामाख्या से कच्छ तक समझी और बोली जाती है। देश की रक्षा में तैनात वीर सैनिकों को एक सूत्र में बांधने वाली भाषा भी हिंदी है।  भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, और हमारा संविधान नैतिक विशिष्टताओं से भरपूर है। हमारे संविधान के प्रमुख आधार स्तंभ हैं- लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, समता एवं सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय। इन्हें हम तब तक सार्थक नहीं कर सकते जब तक राष्ट्रीय एकता सुदृढ़ नहीं हो जाती।

 

 जो भाषा माता की गोद में स्वाभाविक रूप में सीखी जाती है वह मातृभाषा है। किसी क्षेत्र का सामान्य व्यक्ति प्रचलित शैली में जो भाषा बोलता है वह जनवभाषा है। प्रादेशिक भाषा वह है जो कुछ गांवों की या छोटे से भूभाग की नहीं,एक विस्तृत क्षेत्र या भूभाग या प्रदेश की भाषा है। जिस देश में अनेक प्रदेश हों और वहाँ कई भाषाएँ हों, उन्हें एक दूसरे से संपर्क के लिए भाषा की जरूरत होती है उसे संपर्क भाषा कहती है।  देश के एक भाग के निवासी जब अपने देश के अन्य भागों के लोगों से मिलें, उनसे कारोबार करें, तब जिस भाषा के माध्यम से वे अपने विचारों का आदान-प्रदान करते रहे हैं, वह उस देश की राष्ट्रभाषा कही जाती है। राजभाषा वह है  जिसे सरकारी कामकाज की भाषा के रूप में प्रयोग करने का निश्चय किया जाए। राजभाषा संविधान द्वारा बनाई गई एक व्यवस्था है जिससे केंद्र सरकार के शासन में एकरूपता संभव हो, एवं केंद्र सरकार के कर्मचारी का कर्तव्य  है कि वह अपना काम राजभाषा में करे।  राजभाषा  मूलतः प्रशासन की भाषा होती है और वहीं उसका क्षेत्र विस्तार होता है। शासन में, कानून बनाने, आदेश निकालने, अध्यादेश जारी करने, प्रतिवेदन,ज्ञापन,सूचना प्रसारित करने, लेखा-जोखा तैयार करने, व्यावसायिक काम करने, आदि के लिए जो भाषा अपनाई जाती है वस्तुतः उसी का नाम राजभाषा है। इसका प्रयोग प्रशासन द्वारा आम आदमी से संपर्क के लिए किया जाता है। अतः राजभाषा का स्वरूप साहित्य की भाषा का नहीं हो सकता है। राजभाषा का स्वरूप ऐसा होना चाहिए  जो सारे देश के हिंदी भाषी और हिंदीतर भाषी, सभी लोगों को आसानी से समझ में आ पाए। इस भाषा में वे सभी शब्द शामिल किए जाने चाहिए जो जनता में प्रचलित हो गए हों। कार्यालय में प्रयुक्त हो रही भाषा में कार्यालयी संस्कार होता है और कार्यालय की विभिन्न कार्रवाइयों के लिए अलग-अलग शब्द निर्धारित होते हैं। प्रशासन की भाषा एक अलग तरह की भाषा  होती है जो सीधे-सीधे अपने विषय पर बात करती है। उसमें क्लिष्ट भाषा शैली के लिए कोई स्थान नहीं होता है।

 राजभाषा में कठिन और कम सुने जाने वाले शब्दों के इस्तेमाल से राजभाषा को अपनाने में हिचकिचावट बढ़ती है। दूसरी भाषाओं के प्रचलित शब्दों का प्रयोग करने में  हिचक नहीं होनी चाहिए। हिंदी में लिखा तकनीकी शब्द कठिन लगे तो ब्रेकेट में अंग्रेजी पर्याय लिख देना चाहिए। भाषा अपने आप में कठिन या आसान अथवा समर्थ या असमर्थ नहीं होती, उसके प्रयोग करने वाले ही उसे सामर्थ्य या अर्थवत्ता प्रदान करते हैं। जिस शब्द से हम परिचित होते हैं वह शब्द हमें आसान लगता है और जिससे हम परिचित नहीं होते वह कठिन लगता है। संविधान के अनुच्छेद 343(1) में व्यवस्था है कि संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी तथा संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा। अनुच्छेद 343(2) के अनुसार संविधान लागू होने के 15 वर्ष की अवधि तक संघ सरकार के कार्यालयों में अंग्रेजी का प्रयोग जारी रखने की व्यवस्था की गई है। अनुच्छेद 343(3) में संसद को अधिकार दिया गया है कि वह अधिनियम पारित करके 15 साल के बाद भी सरकारी कामकाज में आवश्यकता हो तो अंग्रेजी का प्रयोग जारी रखने के बारे में व्यवस्था कर सकेंगे। संविधान के अनुच्छेद 344 के अनुसार राष्ट्रपति ने 1955 में श्री बाल गंगाधर खेर की अध्यक्षता में प्रथम राजभाषा आयोग गठित किया और आयोग ने अपनी रिपोर्ट 1956 में प्रस्तुत की। 1957 में इस आयोग की सिफारिशों पर विचार करने के लिए एक संसदीय समिति गठित की गई। आयोग और समिति दोनों का विचार था कि 26 जनवरी,1965 के बाद भी अंग्रेजी का प्रयोग जारी रखा जाना चाहिए। इन सिफारिशों को ध्यान में रखकर भारतीय संसद ने राजभाषा अधिनियम, 1963 पारित किया जिसमें 1967 में संशोधन किया गया।  दिसंबर 1967 में संसद के दोनों सदनों में भाषा नीति संबंधी एक संकल्प पारित किया गया जो 18 जनवरी ,1968 को अधिसूचित किया गया। इस संकल्प के पैरा एक के अनुसार केंद्रीय सरकार को यह दायित्व सौंपा गया कि वह हिंदी के प्रचार-प्रसार तथा विकास और संघ के विभिन्न शासकीय प्रयोजनों के लिए इसके उत्तरोत्तर प्रयोग में गति लाने हेतु एक गहन कार्यक्रम तैयार करे और उसे कार्यान्वित करे। तदनुसार राजभाषा विभाग में हर वर्ष केन्द्रीय सरकार के सभी कार्यालयों के लिए एक वार्षिक कार्यक्रम तैयार किया जाता है जिसमें हिंदी में काम करने के लिए लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं।

      केंद्रीय सरकार की राजभाषा नीति के अनुपालन के विचार से राजभाषा नियम 1976 में क, ,,ग क्षेत्र बनाए गए। राजभाषा अधिनियम की धारा 3(3) के अंतर्गत आने वाले सभी कागजात केन्द्रीय सरकार के कार्यालयों को, चाहे वे किसी भी क्षेत्र में हों, द्विभाषी में जारी करने होते हैं। इस तरह के कागजात को द्विभाषी में जारी करना राजभाषा अधिनियम की सांविधिक अपेक्षा है। किसी भी कार्यालय में हिंदी में प्राप्त किसी भी पत्र का उत्तर हिन्दी में ही दिया जाना होता है। राजभाषा विभाग द्वारा प्रत्येक वर्ष हिन्दी के प्रगामी प्रयोग के लिए जारी किए जाने वाले वार्षिक कार्यक्रम में पत्राचार आदि के लिए विभिन्न क्षेत्रों के वास्ते अलग-अलग लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं। राजभाषा विभाग इन लक्ष्यों की प्राप्ति के सम्बन्ध में सभी मंत्रालयों/विभागों/कार्यालयों आदि से प्रत्येक वर्ष एक रिपोर्ट प्राप्त करता है और उसके आधार पर एक मूल्यांकन रिपोर्ट तैयार कर संसद में पेश की जाती है।

सरकार राजभाषा नीति को कार्यान्वित करने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। विभिन्न मंत्रालयों/विभागों में उच्चस्तरीय हिन्दी सलाहकार समितियों का गठन किया गया है। नीति संबंधी दिशा निर्देश के लिए प्रधान मंत्री जी की अध्यक्षता में केन्द्रीय हिन्दी समिति गठित की गई है। विभिन्न मंत्रालयों/विभागों/उपक्रमों/कार्यालयों आदि में राजभाषा कार्यान्वयन समितियाँ गठित की गई हैं। देश के लगभग प्रमुख नगरों में 450 से अधिक नगर राजभाषा कार्यान्वयन समितियां कार्यरत हैं। इन समितियों की बैठकें समय-समय पर आयोजित की जाती हैं और इन बैठकों में हिन्दी के प्रयोग की स्थिति की समीक्षा की जाती है। इसके अतिरिक्त संसद द्वारा एक उच्च स्तरीय संसदीय राजभाषा समिति भी गठित की गई हैं जिसकी उप समितियां केन्द्रीय सरकार के कार्यालयों, उपक्रमों बैंकों आदि का समय-समय पर निरीक्षण करती है। इस प्रकार सरकार की राजभाषा नीति को लागू करने के लिए पूरे देश में एक विशाल नेटवर्क तैयार किया गया है

      केन्द्रीय सरकार के काम-काज में हिन्दी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न पुरस्कार योजनाएं तथा प्रोत्साहन योजनाएं चालू की गई हैं। इन योजनाओं में राजभाषा कीर्ति एवं गौरव पुरस्कार योजना प्रमुख है। इसके अन्तर्गत भारत सरकार के मंत्रालयों/विभागों/बैंकों/उपक्रमों आदि को राजभाषा शील्ड प्रदान की जाती है और कर्मचारियों द्वारा हिन्दी में लिखी गई मौलिक पुस्तकों के लिए नकद पुरस्कार दिए जाते हैं। हिन्दी में मूल रूप से टिप्पण और प्रारूप लेखन के लिए एक प्रोत्साहन योजना 1975 से चल रही है जिसे 01.04.1988 से और उदार बनाया गया है। अंग्रेजी के अतिरिक्त हिन्दी में काम करने वाले आशुलिपिकों तथा टाइपिस्टों को प्रोत्साहन भत्ता दिया जाता है। इन सब योजनाओं का उद्देश्य यह है कि हम देश के सभी भागों के कर्मचारियों को केन्द्रीय सरकार के कामकाज में हिन्दी का प्रयोग बढ़ाने के लिए प्रेरित करें ताकि धीरे-धीरे वह सब काम हिन्दी में होने लगे जो राजभाषा नीति के अनुसार हिन्दी में होना चाहिए पर अभी तक अंग्रेजी में होता रहा है

राजभाषा विभाग द्वारा निदेश दिए गए हैं कि केन्द्रीय सरकार के सभी कार्यालयों/विभागों तथा उनके संबद्ध और अधीनस्थ कार्यालयों, केन्द्रीय सरकार के स्वामित्व में या नियंत्रणाधीन निगमों, उपक्रमों तथा बैंकों में, चाहे वे किसी भी क्षेत्र में स्थित हों, सभी सेवाकालीन विभागीय और पदोन्नति परीक्षाओं में, जिनमें अखिल भारतीय स्तर की परीक्षाएं भी शामिल हैं, उम्मीदवारों को इस बात की छूट दी जाए कि वे प्रश्न-पत्रों के उत्तर हिन्दी या अंग्रेजी में दे सकें। ये अनुदेश भी दिए गए हैं कि इन परीक्षाओं के प्रश्न-पत्र हिन्दी एवं अंग्रेजी दोनों भाषाओं में तैयार कराएं जाएं और साक्षात्कार के लिए बुलाए जाने वाले उम्मीदवारों को प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में देने की छूट दी जाए।

     किसी एक व्यक्ति या विभाग द्वारा राजभाषा कार्यान्वयन का काम शत-प्रतिशत करने से अपेक्षित  लक्ष्य प्राप्त करना संभव नहीं है। यदि राजभाषा विषयक कार्यों का केवल कार्यालय के हिंदी अनुभाग का ही कार्य न मानकर अगर सब लोग एक जुट होकर समानता के साथ अपनी जिम्मेदारी और क्षमता का निर्वहन करें तो सामूहिक रूप से इसका प्रयोग निश्चित रूप से कई गुना बढ़ जाएगा। 

       राजभाषा नीति का कार्यान्वयन, प्रेरणा-प्रोत्साहन और सद्भाव पर आधारित है। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि भाषा किसी के ऊपर जबरन लादी नहीं जानी चाहिए। इसीलिए सरकार की नीति किसी पर हिंदी थोपने की नहीं बल्कि प्रेरणा और प्रोत्साहन के जरिये अनुपालन कराने की है। अतः राजभाषा हिंदी के प्रगामी प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए हमें इसी दिशा में प्रयास करने होंगे तथा राजभाषा के प्रयोग में गर्व का अनुभव करना होगा। राजभाषा हिंदी को प्रोत्साहित करने के लिए  हम सबके द्वारा किया गया अकेला प्रयास भी सागर को भरने वाली बूंद का कार्य करेगा। हम संकल्प लें कि हम भाषा के इस पुनीत राष्ट्रीय दायित्व में मन, वचन और कर्म से अपना योगदान प्रदान करेंगे।


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