गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित ‘रामचरित मानस’ हिंदी साहित्य में ही नहीं, विश्व साहित्य में निराला है। यह कृति मूलतः आदिकवि वात्मीकी की रामायण पर आधारित है। रामचरित मानस लगभग दो वर्ष सात महीने में लिखा गया। यह ग्रंथ “नाना पुराण निगमागम” का समन्वय है। तुलसीदास को वेद-वेदांत, उपनिषद्, पुराण आदि विषयों का गहन ज्ञान था। अपने युग की सब प्रकार की परिस्थितियों एवं समस्याओं से वह सुपरिचित थे। उन्होंने सामाजिक जीवन को सुख-शांतिपूर्ण बनाने के लिए लोकमर्यादा की आवश्यकताका अनुभव किया। इस महाकाव्य में साहित्य के सभी रसों का आस्वादन मिलता है। यह ग्रंथ काव्य कला की दृष्टि से सर्वोच्च कोटि का साहित्य है। आदर्श गार्हस्थ्य जीवन, आदर्श राजधर्म, आदर्श पारिवारिक जीवन, आदर्श पातिव्रत धर्म, आदर्श भ्रातु धर्म के साथ –साथ सर्वोच्च भक्ति, ज्ञान, त्याग, वैराग्य तथा सादाचार की शिक्षा देने वाला, स्त्री पुरुष, बालक-वृद्ध और युवा- सब के लिए समान उपयोगी एवं सर्वोपरि सगुण- साकार भगवान की आदर्श मानव-लीला तथा उनके गुण, प्रभाव, रहस्य तथा प्रेम के गहन तत्व को अत्यंत सरल, रोचक एवं ओजस्वी शब्दों में व्यक्त करने वाला कोई दूसरा ग्रंथ हिंदी भाषा में ही नहीं, कदाचित् संसार की किसी भाषा में आज तक नहीं लिखा गया। भक्ति, ज्ञान, नीति, सादाचार का जितना प्रचार जनता में इस ग्रंथ से हुआ है, उतना कदाचित् और किसी ग्रथ से नहीं हुआ।
रामचरित मानस एक आशीर्वादात्मक ग्रंथ है। इसके प्रत्येक पद्य को श्रद्धालु लोग मंत्रवत् आदर देते हैं और पाठ से लौकिक एवं पारमार्थिक अनेक कार्य सिद्ध करते हैं। संसार में सुख-शांति एवं प्रेम का प्रसार करने तथा भगवत कृपा का जीवन में अनुभव करने के लिए ‘रामचरित मानस’ का पाठ एवं अनुशीलन परम आवश्यक है।
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