आज के युग में कौशल विकास और प्रशिक्षण की उपादेयता और उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता। प्रशिक्षण के द्वारा संस्था तथा कर्मचारी दोनों के कार्य की गुणवत्ता तथा मात्रा बेहतर बनती है, ज्ञान, कार्यकुशलता तथा उत्पादकता में वृद्धि होती है। प्रशिक्षण के द्वारा कार्य करने की सर्वश्रेष्ठ उपलब्ध कार्यविधियों का मानकीकरण किया जा सकता है। प्रशिक्षण से कर्मचारियों के कार्य संबंधी संतोष तथा मनोबल में भी वृद्धि होती है तथा उनमें सकारात्मक सोच विकसित होती है। उसके कार्य व्यवहार में भी गुणात्मक सुधार होता है। प्रशिक्षित कर्मचारी नए तथा चुनौतीपूर्ण कार्य स्वीकार करने में तत्पर रहते हैं। सरकारी तंत्र का जिम्मेदार तथा जवाबदेह विकास बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि इसके विभिन्न स्तर के कार्मिकों के ज्ञान, कार्यकुशलता तथा कार्य के प्रति दृष्टिकोण का क्या स्तर है। देखा जाए तो यही तीन बातें प्रशिक्षण का मर्म है। किसी पद के लिए निर्धारित शैक्षणिक योग्यता मात्र ही उस पद के कार्य निष्पादन की अंतिम जमानत नहीं कही जा सकती। कार्य निष्पादन के लिए उस क्षेत्र विशेष में प्रशिक्षण से व्यक्ति की कार्यक्षमता में निखार आता है।
अंतर्राष्ट्रीय मजदूर संगठन
के अनुसार “किसी भी संस्था में ऐसे क्रिया-कलाप को प्रशिक्षण
कहते हैं जो रोजगारपरक व्यावहारिक, ज्ञान, दक्षता तथा रुझान प्रदान करने के उद्देश्य से किए
जाएँ।” प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्ट्रेटन ने प्रशिक्षण की
परिभाषा इस प्रकार दी है- “ज्ञान, दक्षता, तकनीक, रुझान तथा अनुभव का ऐसा विकास जो किसी भी व्यक्ति
को इतना योग्य बना दे कि वह जिस संस्था में है, उसमें
अधिक प्रभावशाली योगदान दे सके।”
प्रशिक्षण द्वारा किसी विषय
की सभी जटिलताओं से परिचय कराया जाता है और इसका समाधान किया जाता है। एडविन बी
फिलप्पो के अनुसार, “एक विशेष कार्य को करने के लिए कर्मचारी के ज्ञान
और कौशल में वृद्धि करने का कार्य प्रशिक्षण कहलाता है।” इन परिभाषाओं से प्रशिक्षण देने के महत्व को समझा जा सकता है। प्रशिक्षणविहीन
व्यक्ति की तुलना समुद्र के बीच बैठे उस मल्लाह से की जा सकती है जो नाव की पतवार
नहीं संभाल पाता एवं किनारे तक पहुंचने के लिए नाव को चलाना नहीं जानता।
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